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स्टैंडअप व टीवी में कौमेडी के अलावा सुनील ग्रोवर फिल्मों में भी कई सशक्त भूमिकाएं निभा चुके हैं. 6 साल पहले सायलैंट कौमेडी वाले सीरियल ‘गुटरगूं’ से चर्चा में आए सुनील ग्रोवर को मशहूर व्यंग्यकार जसपाल भट्टी की खोज माना जाता है. पर उन्हें रातोंरात स्टार बनाया कपिल शर्मा के शो ने. इस शो में उन के द्वारा किए गए महिला के किरदार गुत्थी ने उन्हें स्टार बना दिया. हालांकि बाद में कपिल शर्मा के साथ उन का विवाद हुआ और वे इस शो से अलग हो गए. कपिल शर्मा से अलगाव के बाद सुनील ग्रोवर नया कौमेडी शो ले कर भी आए, पर वैसी सफलता नहीं मिली.

2017 में वे फिल्म ‘कौफी विथ डी’ में पत्रकार की मुख्य भूमिका में नजर आए. इस से पहले वे फिल्म ‘बागी’ में श्रद्धा कपूर के पिता के किरदार सहित कुछ दूसरी फिल्में भी कर चुके हैं. फिलहाल वे स्टेज शो व इवैंट में ही ज्यादा व्यस्त हैं. 2017 में फोर्ब्स पत्रिका की सौ सैलिब्रिटीज की सूची में स्टैंडअप कौमेडियन सुनील ग्रोवर 77वें नंबर पर हैं.

स्टैंडअप कौमेडियन बनने को ले कर वे बताते हैं, ‘‘मैं पंजाब व हरियाणा सीमा पर स्थित डवाली गांव से हूं. वहां से चंडीगढ़ अभिनय की ट्रेनिंग लेने गया. फिर दिल्ली आ गया. दिल्ली से मुंबई. दिल्ली में एक समाचार चैनल में नौकरी भी की. मुंबई में अभिनेता बनने के लिए काफी संघर्ष किया. फिर मैं विज्ञापनों से जुड़ गया. कुछ फिल्मों में अपनी आवाज भी दी. उस से पहले मैं ने चंडीगढ़ के ड्रामा स्कूल से ड्रामा की ट्रेनिंग ली. वहां मैं ने कई गंभीर विषयों या दारूण कथा बयां करने वाले नाटकों में अभिनय किया.

‘‘जसपाल भट्टी के साथ मैं हास्य के लाइव शो किया करता था यानी चंडीगढ़ में थिएटर पर लोगों को रुलाना और स्टेज पर हंसाना, यही मेरा विरोधाभासी काम था तो 2 विषयों को ले कर मेरी ट्रेनिंग बहुत अच्छी हुई. मैं दोनों चीजें कर रहा था. मुझे यह नहीं पता था कि मेरे कैरियर की शुरुआत कहां से किस रूप में होगी. मिमिक्री मैं बहुत किया करता था. फिर मैं ने एक फिल्मी चैनल पर एक कार्यक्रम ‘लल्लन’ किया. कौमेडी में पहचान बन गई. फिर कपिल शर्मा के शो से मुझे काफी शोहरत मिली.

‘‘जहां तक स्टैंडअप कौमेडियन बनने का सवाल है, तो स्टैंडअप कौमेडियन बनने के लिए हमारे देश में कोई इंस्टिट्यूट तो है नहीं. हमें खुद ही यह कला अपने अंदर विकसित करनी पड़ी. वास्तव में चंडीगढ़ में जसपाल भट्टी से मेरी मुलाकात हुई थी. उन्होंने मेरा पहला औडिशन लिया था. उन से मैं ने ह्यूमर के बारे में बहुतकुछ सीखा. उन से मैं ने सीखा कि क्राफ्टेड ह्यूमर क्या होता है. उन की सीख का ही परिणाम है कि मैं लोगों के चेहरों पर मुसकान लाने में कामयाब हो पाया हूं.’’

अभिनय को कैरियर बनाने की वजह को ले कर सुनील कहते हैं, ‘‘मेरे दिमाग, मेरे शरीर में अभिनय था. बचपन से ही बड़ा बनना चाहता था- डाक्टर, इंजीनियर या पायलट वगैरह. एक जीवन में ये सब बन नहीं सकता था. पर कलाकार के तौर पर मैं सबकुछ बन सकता हूं, इसलिए मैं ने अभिनय को चुना. लेकिन मैं लोगों के लिए हास्य का डाक्टर हूं. लोगों को मेरे हंसाने से फायदा होता है. हमारे हंसाने से उन्हें तनाव से मुक्ति मिलती है तो मुझे खुशी होती है कि मेरा योगदान किसी न किसी रूप में समाज के लिए हो रहा है.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘पहले हमें लगता था कि हम अभिनय का यह काम अपने लिए कर रहे हैं. मकान, गाड़ी खरीदनी है वगैरहवगैरह. फिर समझ आया कि हम इस दुनिया में इसलिए आए हैं कि समाज में जा कर लोगों के चेहरों पर मुसकान ला सकें.’’

कपिल शर्मा के शो से अलग होने के विवाद व नए शो को ले कर उन का कहना है, ‘‘वह शो मैं ने नहीं बनाया था. पर कपिल शर्मा के शो से अलग होने पर जब मैं बेरोजगार था, तब मुझे यह शो मिला था. पर चला नहीं, क्योंकि बहुत बेकार शो था. हालांकि हम सभी ने मेहनत की थी.’’

टीवी से दूर होने पर उन का मानना है, ‘‘मुझे इस का कोई गम नहीं है. जब आप किसी प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं तो एक यात्रा चलती रहती है. नएनए शो आते हैं. वे कुछ समय बाद बंद हो जाते हैं. हम दूसरे शो के साथ जुड़ते हैं. यह सब चलता रहता है, लेकिन एक वक्त ऐसा आता है जब आप महसूस करते हैं कि आप को इस पर नए सिरे से विचार करने के लिए, जिंदगी में उस की जरूरत को समझने के लिए समय चाहिए. इसलिए आप कुछ समय के लिए उस से दूरी बना लेते हैं.’’

वे कहते हैं, ‘‘सच कहूं तो कई माह से टीवी से दूर रहते हुए भी मैं दोस्तों, रिश्तेदारों, प्रशंसकों के उन सवालों के जवाब देने में व्यस्त रहा, जिन्हें मैं खुद नहीं समझ सका. पर मेरी समझ में यह आया कि टीवी ने मुझे लोगों के बीच ढेर सारा प्यार, मानसम्मान बख्शा है. मुझे उस वक्त गर्व का एहसास होता है जब लोग मुसकरा कर मेरा स्वागत करते हैं. कपिल शर्मा का कौमेडी शो छोड़ने के बाद मैं ने ढेर सारे इवैंट किए और बहुत यात्राएं कीं. इन इवैंट और यात्राओं के दौरान मैं ने महसूस किया कि मेरे आसपास कितना प्यार है. फिर मेरी समझ आया कि मुझे अपने प्रशंसकों के लिए टीवी पर शो करते रहना चाहिए.’’

टीवी के कौमेडी शो बहुत कम चल पाते हैं,  इस सवाल पर वे मानते हैं, ‘‘हर फिल्म भी सुपरहिट नहीं होती. मेरी राय में एक कलाकार को अपने यकीन के अनुसार लगातार काम करते रहना चाहिए. हम अपने अनुभवों के आधार पर जो ठीक समझते हैं, वही बनाते हैं. हमें नहीं पता होता कि कौन सी बात दर्शकों को पसंद आएगी. इसलिए हरदम कुछ नया करने का प्रयास करते हैं. आज का दर्शक बहुत समझदार है. कई बार हम हंसते हैं और समझते हैं कि वे इसे नहीं समझ पाए, मगर दर्शक हमें गलत साबित कर देते हैं. आखिरकार, हम हर शो अपने देश के लोगों के लिए ही बनाते हैं.’’

कौमेडी करना कितना आसान या मुश्किल है, इस बाबत सुनील कहते हैं, ‘‘कौमेडी सब से ज्यादा कठिन काम है. कौमेडी वही कर पाते हैं, जो हर लमहे में ह्यूमर तलाशते हैं. वे अपने आसपास के माहौल से कौमेडी निकाल लेते हैं. हर इंसान की जिंदगी में कुछ न कुछ तकलीफें होती हैं. उन तकलीफों के बीच खुश रह कर कौमेडी को जन्म देने वाला ही असली हास्य कलाकार है. अच्छे हास्य के लिए अच्छे लेखक व माहौल की जरूरत होती है.’’

लोगों को हंसाना जरूरी क्यों मानते हैं. इस पर सुनील का कहना है, ‘‘डाक्टर व मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि मुसकराहट एक कला है. मुसकराहट का ही अगला पायदान है, हंसना और हंसाना. हंसना तो वायरल की तरह है. एक इंसान हंसता है, तो उसे देख कर दूसरे को भी हंसी आ ही जाती है. हंसी तो जीने का टौनिक है. तनाव व दिल की बीमारी से छुटकारा पाने का आसान तरीका है हंसना और हंसाना. इसलिए, मेरी राय में हर इंसान को हंसाते रहना चाहिए.’’