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स्टैंडअप कौमेडियन के रूप में मशहूर हुए हास्य कलाकार राजीव निगम ने कई शो लिखे और किए हैं. कानपुर के राजीव निगम को लोगों को हंसाना बहुत पसंद है,लेकिन उनके पिता चाहते थें कि वे डौक्टर बने और इसके लिए वे अपनी संपत्ति बेच भी सकते थें, ऐसे में राजीव ने सोचा कि एक डौक्टर और हास्य कलाकार में कोई फर्क नहीं होता, दोनों ही अच्छी सेहत के लिए काम करते हैं.

इसलिए उन्होंने इस क्षेत्र में कदम रखा और उनकी पहली कामयाबी ‘मुवर्स एंड शेकर्स’ थी, जिसके लिए उन्होंने शेखर सुमन के साथ लिखने का काम किया है. उनके परिवार में उनकी पत्नी अनुराधा निगम और उनके दो बच्चे यशराज (11 वर्ष) और देवराज (7 वर्ष) हैं, जो उन्हें हमेशा सहयोग देते हैं. उनसे भी वे बहुत सारी चीजें सीखते हैं. अभी वे स्टार प्लस की एक कौमेडी शो ‘’हर शाख पे उल्लू बैठा है” में चैतू लाल की मुख्य भूमिका निभा रहे है. उनसे बातें करना मजेदार था.

प्र. इस शो से जुड़ने की वजह क्या है?

कौमेडी मैं सालों से कर रहा हूं, लेकिन ह्यूमर वाली कोई शो नहीं है, जबकि ह्यूमर हर व्यक्ति के लिए अच्छा होता है. इस शो में देश की समस्या को दिखाने की कोशिश की जा रही है, जिसे हम व्यक्त नहीं कर पाते और दिल में होती है.

प्र.कौमेडी का सफ़र कैसे शुरू हुआ?

कौमेडी मुझे बचपन से पसंद था. मुझे याद आता है कि कौलेज के दौरान इलेक्शन कैम्पेन में काम करने के दौरान कुछ पैसे मिल जाते थे, जिसमें मुझे माइक से उस पार्टी के लिए प्रचार करना पड़ता था. इस काम के साथ-साथ मैं अपनी क्रिएटिविटी भी निखारता रहता था. मुझे हर चुनाव में काम मिल जाता था, इससे मुझे उन नेताओं को नजदीक से समझना भी आसान था.

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आज जो मैं यह शो कर रहा हूं, उसमें मेरे सारे वही अनुभव काम आ रहे हैं. इसी तरह सफर शुरू हुआ और धीरे-धीरे यहां तक पहुंच गया. मैंने अपना करियर एक लेखक के रूप में शुरू किया था, पोलिटिकल सेटायर मैं लिखता रहा. ‘मुवर्स एंड शेकर्स’ मेरा पहला काम था, इसके बाद ‘लाफ्टर चैलेन्ज’ में काम करते हुए भी मैंने पोलिटिकल सेटायर को हमेशा कायम रखा.

प्र. आपकी प्रेरणा कौन है?

जब मैं घर से निकला था, तो कुछ भी नहीं था, पर आज यहां हूं. कौमेडियन होने के लिए एक अच्छा ह्यूमन बीइंग होना चाहिए. ऐसा मैं कौमेडियन जौनी लीवर में पाता हूं और वही मेरे प्रेरणास्रोत है.

प्र.कानपुर से मुंबई कैसे आना हुआ? कितना संघर्ष था?

21 वर्ष की उम्र में साल 1994 मैं कानपुर से मुंबई काम की तलाश में आया था. उस समय बहुत मुश्किल दौर था. इतने सारे चैनल और मोबाइल नहीं थे, इतना काम नहीं होता था, लेकिन विचार बहुत आते थे.

कम्युनिकेशन अच्छी होने की वजह से आज संघर्ष कम हो गया है, काम मिलने की संभावनाएं अधिक हो चुकी है, लेकिन तब ये सब मुश्किल था. काम होने के बावजूद भी किसी व्यक्ति से जुड़ने में समय लग जाता था. रहने, खाने, पीने सब में समस्या थी. मैंने पास रहने वाले पान वाले से अनुरोध किया था कि मेरे कौल आने पर मुझे बता दे. कई बार वह बता देता था, कभी भूल भी जाता था, पर मैंने उस दौरान लिखना जारी रखा, जो भी मन में आता था, उसे लिख लेता था. वही लिखावट को मैंने शो में प्रयोग किया. शो हिट होने से एक के बाद एक काम मिलता गया.

संघर्ष के इस दौर में मेरे एक मित्र जो किंग्स सर्किल में सैलून चलाते थे, उन्होंने काफी हेल्प किया. साल डेढ़ साल संघर्ष में ही बीत गया. कभी काम मिला कभी नहीं, परिवार से सहयोग तब नहीं था, पर मेरे अंदर एक जूनून था. कुछ समय संघर्ष के बाद मैं कानपुर वापस चला गया. कानपुर के बिठुर में, मैं एक कवि सम्मेलन देखने गया था, वहां कवि नहीं आया था, ऐसे में मुझे उस सम्मेलन को सम्हालने के लिए कहा गया, मैंने वहां जो कुछ भी किया, दस हज़ार लोग खुश हो गए, इससे मुझमें प्रेरणा जगी और मैं इस क्षेत्र में आ गया.

प्र. टीवी इंडस्ट्री में स्टैंड अप कौमेडियन का काम कर आप कितने संतुष्ट है?

मैं अपने काम से बहुत अधिक संतुष्ट नहीं हूं, स्टैंड अप कौमेडियन की भी कई कैटेगरी होती है. कुछ तो इंटरनेट से लेकर उसे ही तोड़-मरोड़ कर लोगों के सामने पेश कर देते है. जबकि असल में एक स्टैंड अप कौमेडियन समाज के रियल चीजो को देखकर उन्हें एक मजेदार रूप में पहुंचाता है, पर टीवी में खुलकर काम करने का मौका नहीं मिलता. ये खुलकर काम करने की विधा है. यहां पाबन्दी होती है, आप जो चाहे उसे कह नहीं सकते, अगर कह भी दिया, तो आगे जाकर उसे काट दिया जाता है. इस तरह जो मजा मैंने उसे बनाते वक़्त लिया है, वह पूरी तरह से दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती.

प्र. आजकल हर चीज पर विरोध होने लगा है, इससे हास्य कला कितनी प्रभावित होती है?

केवल कौमेडी ही नहीं, हर बात पर आजकल विरोध हो रहा है. आज समाज असहिष्णु हो चुका है और इसे करने वाले काफी लोग है. हर एक पार्टी आती है और अपनी पीठ थपथपाती है और अलग-अलग बातें करती है. लोग भी बहुत दुविधा में पड़ जाते है कि वे जाएं तो जाएं कहां और किसके संग? ये समस्या है.

मैंने एक संवाद लिखा और मैंने नरेन्द्र मोदी की आवाज में एक व्यक्ति से बुलवाया, लेकिन उन्हें लोग इतना मानते है कि लोगों को उनकी आवाज को लेने से आपत्ति हुई और अंत में उसे हटाना पड़ा. हमने तो सिर्फ उनकी आवाज को प्रयोग किया था, बाकी तो सामान्य बातें कर रहा था. इसके बावजूद समस्या आई.

कला की आज़ादी इससे ख़त्म हुई है, लेकिन कैसे हुआ, ये समझना मुश्किल है. पहले ऐसा नहीं था, कई शो में तो मैंने डायरेक्टली अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, सोनिया गांधी, लालू यादव आदि के स्वर का प्रयोग किया और तब कुछ भी नहीं हुआ. इससे ऐसा लगता है कि ह्यूमर, सेटायर, कौमेडी में जहां हमें आगे बढ़ने की जरुरत थी, 20 साल बाद भी हम नीचे आ गएं और ये हम सबका दुर्भाग्य है.

प्र. कौमेडी में दो अर्थ वाले शब्दों के प्रयोग को कितना सही मानते है?

ये हर लोग की सोच पर निर्भर करती है. कुछ इसे पसंद करते है कुछ नहीं. हर चीज का बाज़ार है. मै ‘बिलो द बेल्ट’ कौमेडी नहीं करता. मेरे पास अच्छी और हंसाने वाली कौमेडी है तो मुझे ये सब करने की कोई जरुरत नहीं.

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प्र. नये लोगों को इस क्षेत्र में आने के लिए क्या सलाह देते है?

ये क्षेत्र अब काफी कठिन हो गया है, पहले जैसे कुछ चुटकुले सुना दिए और आप हास्य कलाकार बन गए, अब ऐसा नहीं है. अभी आपको पूरी शोध के साथ औब्जरवेशन करना पड़ेगा, जागरूक रहना पड़ेगा, बहुत सारे लोगों से सीखना पड़ेगा और पूरी तैयारी से आना पड़ेगा. कच्ची पक्की तैयारी से नहीं.

प्र. ‘भारत विकास के पथ पर है’, इस बात को चैतू लाल के शब्दों में कैसे कहेंगे?

भारत का विकास हो रहा है, अगर मुझे समय मिलेगा, तो विकास को दिखाऊंगा. विकास हमारे घर के पीछे रहता है और दो गाड़िया ले चुका है और उसका व्यवसाय भी बढ़ रहा है, ऐसे में कहा जा सकता है कि विकास कहीं हो रहा है.