भोजपुरी सिनेमा ने भले ही 5 दशक से ज्यादा का सफर पूरा कर लिया है लेकिन उसके खाते में 10-12 बेहतरीन फिल्में भी नहीं है. हर साल 50 से ज्यादा भोजपुरी फिल्में बन रही हैं लेकिन हिन्दी फिल्मों की अंधी नकल की वजह से वह न तो प्योर भोजपुरी रह पाती है और न ही पूरी तरह से मुंबईया फिल्में ही बन पाती हैं. हिंदी फिल्मों की घटिया नकल कर भोजपुरी फिल्मकारों ने भोजपुरी फिल्मों का यह हाल कर दिया है कि उसमें भोजपुरी बोली के अलावा कुछ भी भोजपुरी नहीं रह गया है. इसे भोजपुरी फिल्मकारों का दिमागी दिवालियापन ही कहा जाएगा कि वे भोजपुरी फिल्मों का नाम तक हिंदी में ही रखने लगे हैं.

पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहरे पियरी चढ़इबो’ थी, जो 5 फरवरी 1962 में रीलीज हुई थी. 5 लाख रूपए में बनी उस फिल्म ने 75 लाख रूपए की कमाई की थी. विश्वनाथ प्रसाद शहाबादी की बनाई उस फिल्म को मिली भारी कामयाबी के बाद तो भोजपुरी सिनेमा का रास्ता ही खुल गया और धड़ाधड़ एक के बाद एक भोजपुरी फिल्में बनने लगीं. “संईया से भइल मिलनवा”, “तुलसी सोहे तोहार अंगना”, “सोलहो सिंगार करे दुलहनिया”, “बिदेसिया”, “पान खाए सैंया हमार”, “लागी नहीं छूटे राम” जैसी कई फिल्में सामने आई और भोजपुरी सिनेमा को नई ताकत मिली. बाद में यह हाल हुआ कि भोजपुरी सिनेमा माई, गंगा, भौजी, संईया, देवर आदि के नामों और किरदारों में उलझ कर रह गई. इससे आगे की सोच न होने की वजह से 1970 के आते-आते भोजपुरी सिनेमा की गाड़ी पूरी तरह से लड़खड़ा गई.

साल 1977 में हिन्दी सिनेमा के खलनायक रहे सुजीत कुमार और वैंप एवं छोटे-मोटे रोल करने वाली प्रेमा नारायण भोजपुरी फिल्म “दंगल” में हीरो-हीरोइन बन कर आए. ‘दंगल’ भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म थी. ‘दंगल’ के गाना ‘गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा हिल हिल जाए..’ ने तो धमाल ही मचा दिया. उस गाने को मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने आवाज दी थी.

उसके बाद राकेश पांडे और पदमा खन्ना की जोड़ी ‘बलम परदेसिया’ लेकर आई, जिसने कामयाबी के झंडे गाड़ डाले. उसके बाद “धरती मैया”, “दूल्हा गंगा पार के”, “दगाबाज बलमा”, “संईया मगन पहलवानी में”, “हमार दूल्हा” जैसी बीसियों भोजपुरी फिल्में बनीं पर कोई खास धमाल नहीं पैदा कर सकीं. उसके बाद एक बार फिर भोजपुरी फिल्म इंडस्ड्री ‘कोमा’ में चली गई.

‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ साल 2003 में आई और उसने भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में एक बार फिर जान डाल दी. बिहार के भोजपुरी गायक मनोज तिवारी और रानी चटर्जी की इस फिल्म को मिली कामयाबी ने भोजपुरी सिनेमा के पर्दे को फिर से चमकदार बना दिया. उसके बाद तो एक बार फिर भोजपुरी फिल्मों की झड़ी लग गई. फिल्म वितरक विनोद पांडे कहते हैं कि भोजुपरी सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता का ही नतीजा था कि अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, जैकी श्रापफ, शत्रुघ्न सिन्हा, जितेंद्र, रति अग्निहोत्री, नगमा, भाग्यश्री, भूमिका चावला जैसे बॉलीवुड के कलाकारों ने इसमें काम किया. इतना ही नहीं भोजपुरी सिनेमा ने कुणाल सिंह, राकेश पांडे, मनोज तिवारी, रवि किशन, दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, सुदीप पांडे, पवन सिंह, राकेश मिश्रा, खेसारीलाल, पाखी हेगड़े, रानी चटर्जी, मोनालिसा, श्वेता तिवारी, दिव्या देसाई, रिंकू घोष जैसे कई कलाकारों ने खूब दौलत और शोहरत कमाई.

भोजपुरी फिल्मों के वितरक विनोद पांडे कहते हैं कि हिंदी सिनेमा की कोरी नकल, फूहड़ डायलॉग और गीतों ने भोजपुरी सिनेमा का बहुत कबाड़ा किया है. इस वजह से ज्यादातर लोग परिवार के साथ फिल्म देखने से कतराते हैं. भोजपुरी फिल्में बनाने और उससे जुड़े लोगों का वहीं घिसा-पिटा तर्क है कि जो दर्शक देखना चाहता है, वही वे परोसते हैं. हीरो रवि किशन कहते हैं कि भोजपुरी सिनेमा के पॉजिटिव चीजों को देखा जाना चाहिए.

लोग अपनी सोच और बाजार के हिसाब से फिल्में बनाते हैं. एक बार जो चीज चल गई उसे ही कामयाबी की गारंटी मान लेना फिल्मकारों की बहुत पुरानी बीमारी है. जो करोड़ों रूपए खर्च कर फिल्म बनाएगा वह कमाई का ख्याल तो रखेगा ही. पब्लिक की पसंद के हिसाब से फिल्में बनती है. भोजपुरी फिल्मों की वजह से ही बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के सैंकड़ों सिनेमा हॉल बंद होने से बच गए.

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग भले ही कुछ भी दावे कर लें पर यह सच है कि भोजपुरी सिनेमा को वह दर्जा नहीं मिल सका है, जो तमिल, तेलगू, मलयाली, बंगला, कन्नड़, मराठी फिल्मों को हासिल हो चुका है.

भोजपुरी फिल्मों के नामी विलेन उदय श्रीवास्तव कहते हैं कि इस इंडस्ट्री में बाहरी लोगों के घुसने से भोजपुरी फिल्मों की पहचान खत्म हो गई है. साउथ के लोग इसलिए भोजपुरी फिल्म बनाने लगे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे काफी ज्यादा कमाई है. वैसे लोगों को भोजपुरी की माटी की खूबी, उसकी संस्कृति और पहचान आदि से कोई लेना देना नहीं होता है. वह यही समझते हैं कि केवल भोजपुरी बोली में फिल्म बना देने से वह भोजपुरी फिल्म हो जाती है. आज के भोजपुरी फिल्मों में हिंसा और खून-खराबा की भरमार होने से औरतें ऐसी फिल्मों से कट चुकी हैं, जिससे फिल्में चल नहीं पाती हैं.

भारत समेत मॉरीसश, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिनाड आदि देशों में करीब 25 करोड़ लोग भोजपुरी बोलने-समझने वाले हैं. देश में बिहार और उत्तर प्रदेश में भोजपुरी बोलने वाले सबसे ज्यादा है. महाराष्ट्र, पंजाब, चंडीगढ़, गुजरात आदि राज्य भी भोजपुरी सिनेमा के बड़े बाजार हैं क्योंकि बिहार और उत्तरप्रदेश के हजारो-लाखों लोग वहां के कल-कारखानों में काम करते हैं. भोजपुरी सिनेमा के हीरो राजीव मिश्रा कहते हैं कि परदेश में अपनी बोली की फिल्म देख कर लोग अपने गांव की मिट्टी की खूबी जैसा आनंद लेते हैं. इसी वजह से दूसरे राज्यों में भी भोजपुरी फिल्में काफी चलती हैं. वहीं मिटटी की खूबी आज की भोजपुरी फिल्मों से पूरी तरह से गायब हो चुकी है और उसकी जगह पूरी तरह से मुंबईया फिल्मों के स्टाइल ने ले ली है.

हिंदी वाले भी अंग्रेजी टाइटल क्यों रखते हैं : राकेश मिश्रा

भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार राकेश मिश्रा भोजपुरी फिल्मों के हिन्दी टाइटल रखने के चलन के बारे में कहते हैं कि इसमें कोई खराबी नहीं है. साउथ के कई हिट फिल्में हिन्दी में बन रही है और ढेरों मुंबईया फिल्मों के नाम अंग्रजी में रखे जाते हैं. फिल्म बनाने वाला और फायनेंसर यही चाहता है कि किसी भी तरह से उसकी फिल्में हिट हो और उन्हें मुनाफा मिल सके. इसके लिए वह हर हथकंडा अपनाता है. राकेश का दावा है कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री ने खूब तरक्की की है और आज भी उसकी कामयाबी का सफर जारी है. कई फिल्मों के ओवर बजट होने की वजह से इंडस्ट्री को थोड़ा झटका लगा था पर अब सब कुछ पटरी पर लौट आया है. हर इंडस्ट्री में कामयाबी के बाद उठा-पटक और बदलाव का दौर आता है. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री नई तकनीक और पुरानी परंपरा के बीच छटपटा रही है और जल्द ही इसमें भी बदलाव दिखाई देगा.

VIDEO : मौडर्न मौसैक नेल आर्ट

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