सरिता विशेष

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सैंसर बोर्ड से लंबी लड़ाई लड़ने के बाद फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ बौंबे हाईकोर्ट के फैसले से सिनेमाघरों तक पहुंचने में कामयाब रही, लेकिन रिलीज होने से पहले ही इसे औनलाइन लीक कर दिया गया था. फिल्म से जुड़े लोगों ने शक जताया कि इस करतूत में सैंसर बोर्ड से जुड़े लोगों का हाथ है. कुछ साल पहले रितिक रोशन और कैटरीना कैफ की फिल्म ‘बैंग बैंग’ रिलीज से पहले ही इंटरनैट की कई वैबसाइट्स पर दिखने लगी, तो इस के निर्माता ने दिल्ली हाईकोर्ट की शरण ली. कोर्ट ने फौरन कार्यवाही करते हुए इंटरनैट और टैलीकौम सर्विस प्रोवाइडरों को अपनी 72 वैबसाइट्स ब्लौक करने का फैसला सुनाया था.

फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ कई टुकड़ों में इंटरनैट पर दिखी, तो निर्माता ने यह कह कर लोगों को सिनेमाहौल की तरफ खींचने की कोशिश की कि वैबसाइट्स पर दिख रही फिल्म वास्तविक नहीं है. यानी लोगों को सही फिल्म देखनी हो, तो टिकट खरीद कर हौल में देखें पर ऐसा न हो सका. हालांकि यह फिल्म आज तक रिलीज नहीं हो पाई. ‘मोहल्ला अस्सी’ की तरह ही पिछले साल आई फिल्म ‘मांझी : द माउंटेन मैन’ भी रिलीज होने से पहले लीक हो गई, जिस से निर्माताओं को काफी नुकसान हुआ.

पिछले साल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक इंटरव्यू में यह स्वीकार किया कि उन्हें आमिर खान की फिल्म ‘पीके’ काफी पसंद आई, जो उन्होंने इंटरनैट से डाउनलोड कर के देखी थी. सोशल मीडिया पर फिल्म की इस तरह चोरी करने के लिए उन की काफी आलोचना हुई. उन के बयान पर काफी हंगामा मचा. अंगरेजी फिल्म ‘द इंटरव्यू’ को डिजिटल प्लेटफौर्म पर रिलीज किए जाने के बाद इसे पाइरेसी का झटका लगा. फिल्म का हाई डैफिनेशन प्रिंट पाइरेसी से जुड़ी कई वैबसाइट्स पर उपलब्ध हो गया था. इस फिल्म को अपलोड किए जाने के 24 घंटे के भीतर दुनिया में 9 लाख से भी ज्यादा लोगों ने इसे डाउनलोड कर डाला था.

औस्कर  के लिए नौमिनेशन होने के बाद ‘सेल्मा’, ‘वाइल्ड’, ‘अमेरिकन स्नाइपर’, ‘स्टिल एलिस’ और ‘बर्डमैन’ जैसी फिल्मों को एक लाख से भी ज्यादा बार डाउनलोड किया गया. ये कुछ घटनाएं हैं जो फिल्म इंडस्ट्री में पाइरेसी यानी फिल्मों की चोरी, इंटरनैट पर उन की कौपी उपलब्ध होने और वहां से कौपी कर के चोरीछिपे देखे जाने के कारण होने वाले नुकसान की बानगी पेश करती हैं. पाइरेसी यानी गीत, संगीत और फिल्मों की अवैध कौपियां बनाना और उन्हें कम कीमत में या लगभग मुफ्त, लोगों को मुहैया करा देना. दुनिया का शायद ही कोई कोना ऐसा बचा हो जहां पाइरेसी के उस्ताद न बैठे हों. सिनेमाहौल में बैठ कर स्मार्टफोन से या फिल्म अथवा गीतों की रिकौर्डिंग की चोरी कर के इंटरनैट के जरिए या फिर डीवीडी से उन की नकल बाजार में पहुंचाई जा रही है.

बिजनैस के नजरिए से देखें तो पाइरेसी की वजह से हर साल पूरी दुनिया की फिल्म इंडस्ट्री को कम से कम 250 अरब डौलर की चपत लग रही है. हालांकि सभी देशों में नियम और कानून हैं, इस के बावजूद पाइरेसी रूक नहीं पा रही है. समस्या इस से भी कहीं ज्यादा गंभीर है. आतंकी और संगठित रूप से अपराध करने वाले संगठन वीडियो पाइरेसी के जरिए धन उगाही कर उस से आपराधिक करतूतों को अंजाम दे रहे हैं. इंटरपोल की हाउस कमेटी औन इंटरनैशनल रिलेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, गैरकानूनी तरीके से सीडी बनाना या इंटरनैट पर फिल्मों आदि की डाउनलोडिंग से उत्तरी आयरलैंड से ले कर अरब देशों तक में अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों को आर्थिक मदद मुहैया कराने में मदद मिल रही है.

मुश्किल नहीं चोरी

पाइरेसी की समस्या इतनी आम क्यों हो गई है? इस का एक जवाब यह है कि अब इंटरनैट घरघर पहुंचने लगा है. जरूरी नहीं कि कोई फिल्म इंटरनैट पर पहले से मौजूद हो, तभी उस की नकल तैयार की जा सकती है. एक बार सिनेमाहौल जा कर यदि कोई अपने मोबाइल फोन से उसे रिकौर्ड कर लेता है और फिर उसे इंटरनैट पर अपलोड कर देता है, तो भी पाइरेसी का रास्ता खुल जाता है. इंटरनैट पर कुछ जानीमानी वैबसाइट्स हैं जो लोगों को ऐसे चोर रास्ते उपलब्ध कराती हैं. अगर कोई फिल्म आसानी से यूट्यूब पर नहीं मिलती, तो इन वैबसाइट्स पर जा कर उसे चुराया यानी डाउनलोड किया जा सकता है.

पंख लगाती वैबसाइट्स

वैबसाइट्स के जरिए फिल्मों की पाइरेसी के मामले में एक कुख्यात नाम बिट टोरेंट का है. यह वन टू वन फाइल शेयरिंग प्रोटोकोल या सिस्टम है, जिस ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया है. वन टू वन फाइल शेयरिंग का आशय इस से है कि यदि किसी व्यक्ति के पास किसी फिल्म की कौपी है, तो वह उस वैबसाइट पर जा कर उसे अपलोड कर सकता है. इसी तरह दुनिया में कोई भी शख्स इसी वैबसाइट पर वांछित फिल्म की मांग डाल सकता है या उपलब्ध होने पर उसे डाउनलोड कर सकता है. हाई स्पीड में फाइलें डाउनलोड होने, आसान इस्तेमाल और सीमित अपलोड बैंडविड्थ के प्रभावी उपयोग की वजह से बिट टोरेंट से जुड़ना आसान हो जाता है. दावा किया जाता है कि कुल इंटरनैट ट्रैफिक में 35 प्रतिशत हिस्सेदारी बिट टोरेंट की है.

हमारे देश में एक दशक के भीतर ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जब किसी फिल्म का आधिकारिक वर्जन (संगीत या पूरी फिल्म ही) उस की रिलीज से पहले ही इंटरनैट पर आ गया. वर्ष 2010 में ऐसी ही एक घटना अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘पा’ के साथ घटित हुई थी. फिल्म की रिलीज के दिन ही इस की क्लिपिंग्स यूट्यूब पर जारी हो गई थीं. ‘पा’ के प्रोड्यूसर और डायरैक्टर ने इस मामले की शिकायत मुंबई पुलिस में की, लेकिन उस से कोई हल नहीं निकला. इस से बड़ा हादसा मनु कुमारन और सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘तेरा क्या होगा जौनी’ के साथ हुआ. 2 साल में 12 करोड़ रुपए की लागत से बनी यह फिल्म रिलीज होने से पहले ही 10-10 मिनट के 11 टुकड़ों में यूट्यूब पर आ गई थी. निर्माताओं ने यूट्यूब से इस फिल्म को तत्काल अपनी साइट से हटाने का आग्रह किया, तो फिल्म कुछ समय में वहां से हटा तो ली गई, लेकिन इस से जो नुकसान होना था, वह तो हो ही गया.

समस्या का सब से मुश्किल पहलू यह है कि अब फिल्मों और उन के गीतसंगीत की चोरी कोई कठिन काम नहीं रह गया है. पहले तो इस धंधे में लगे लोगों को सिनेमाहौल में जा कर वीडियो कैमरे से पूरी फिल्म की कौपी करनी पड़ती थी लेकिन अब अगर कोई सीधा स्रोत मिल जाए तो सिर्फ एक क्लिक करने भर से उस के हजारों डिजिटल संस्करण तैयार किए जा सकते हैं. जैसा कि, फिल्म ‘तेरा क्या होगा जौनी’ के मामले में हुआ कि उस फिल्म को पोस्ट प्रोडक्शन स्टेज पर एडिटिंग या डबिंग लैब से चुराया गया था.  वीडियो पाइरेसी में लगे लोग आमतौर पर फिल्म रिलीज होने के बाद सिनेमाहौलों में छिपे कैमरों से एक ही बार में अथवा टुकड़ोंटुकड़ों में फिल्में चुराते हैं और बाद में उन्हें एडिट कर के पूरी फिल्म बना लेते हैं.

नुकसान कितना

भारतीय सिनेमा यानी बौलीवुड को हर साल पाइरेसी के कारण कितना नुकसान उठाना पड़ रहा है, इस का अंदाजा 2008 में एक संस्था अर्नस्ट ऐंड यंग ने लगाया था. इस संस्था ने अपने अध्ययन में बताया था कि मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को पाइरेसी के कारण हर साल लगभग 16 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हो रहा है. यह इस इंडस्ट्री की सालाना आमदनी का 40 प्रतिशत है.

चीन में पनप रहा कारोबार

एशिया और यूरोप में ही नहीं, ब्राजील, अर्जेंटीना और पराग्वे जैसे लैटिन अमेरिकी देशों में भी पाइरेसी का जाल फैला हुआ है. एशिया प्रशांत क्षेत्र में इस तरह की पाइरेसी के मामले में चीन भारत से ऊपर है. चीन में इस की दर 79 प्रतिशत है. अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों की देरी से रिलीज की वजह से या रिलीज की अनुमति नहीं मिलने की वजह से चीन जैसे देश में हर साल करीब 2.5 अरब डौलर की पाइरेटेड सीडी का कारोबार होता है. पश्चिमी देशों में कौपीराइट की अवधि 70 साल या फिर कलाकार की मौत तक होती है. लेकिन चीन ने यह अवधि 50 साल तय कर रखी है. इस पर तुर्रा यह है कि इस नियम का वहां ठीक से पालन भी नहीं हो रहा है.

क्या रुक सकती है पाइरेसी

पाइरेटेड फिल्मवीडियो और इंटरनैट पर अवैध डाउनलोडिंगअपलोडिंग का धंधा इस लिहाज से भी ज्यादा आकर्षक बनता जा रहा है कि इस में जोखिम नहीं के बराबर है. इस अपराध में काफी कम लोगों को दंडित किया जाता है. हालांकि फ्रांस में इस तरह के कारोबारी का दोष साबित होने पर 2 साल की कैद और 1.9 लाख डौलर जुर्माने की सजा है. अमेरिका में साल 2014 में लाए गए औनलाइन पाइरेसी विधेयक के मुताबिक सर्च इंजनों के माध्यम से पाइरेसी की सूचना मिलने पर संबंधित गीत, संगीत और फिल्म का कौपीराइट रखने वाले लोग अमेरिकी न्याय विभाग के जरिए अदालती कार्यवाही कर पाएंगे.

जहां तक भारत की बात है, तो वर्ष 2012 में फिल्मों की पाइरेसी रोकने के उद्देश्य से भारत के कौपीराइट कानून में संशोधन कर के गीतकार, संगीतकार, संवाद और पटकथा लेखक के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान किया गया था. लेकिन इस संशोधन के बावजूद दृश्य और संगीत की नकल का कारोबार करने वाली कंपनियों के संबंध में स्थिति स्पष्ट नहीं की गई, जिस का फायदा पाइरेसी में संलिप्त लोग उठाते हैं.

फिल्म इंडस्ट्री की चिंता

पाइरेसी फिल्म इंडस्ट्री के जीवनमरण का प्रश्न बन गई है, इसलिए यह इंडस्ट्री अपने स्तर पर इस से निबटने का प्रयास कर ही रही है. कुछ साल पहले रिलायंस बिग इंटरटेनमैंट, यशराज फिल्म्स, यूटीवी मोशन पिक्चर्स, इरोज इंटरनैशनल और स्टूडियो 18 ने अमेरिका की मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन के साथ ऐंटीपाइरेसी गठबंधन कायम किया था. लेकिन पाइरेसी के खिलाफ चलाई जाने वाली मुहिम में आम लोगों को भी जोड़ने की जरूरत है ताकि वे अपना तात्कालिक लाभ देखने की जगह फिल्म इंडस्ट्री और व्यापक स्तर पर राजस्व के रूप में देश की अर्थव्यस्था को होने वाले नुकसान को भी देख सकें.

एक पहलू यह भी

पाइरेसी के दूसरे पहलू पर भी गौर फरमाना उतना ही जरूरी है जितना कि इस की रोकथाम करना. यह पहलू है सिनेमाहौलों में फिल्मों के महंगे टिकट का. असल में, अब ज्यादातर शहरों में ऐसे मल्टीप्लैक्स खुल गए हैं, जहां 4 लोगों के एक परिवार के फिल्म देखने के लिए जाने का मतलब है कम से कम 1000-1200 रुपए की चपत. ऐसे में एक आम मध्यवर्गीय परिवार मन मसोस कर रह जाता है और अच्छी फिल्में भी नहीं देख पाता है. ऐसे में लोग बरास्ता इंटरनैट संगीत और फिल्म की पाइरेटेड कौपियां अपने कंप्यूटर या टीवी पर चलाते हैं और बिना कुछ ज्यादा खर्च के, घरबैठे मनोरंजन पा जाते हैं. जो सिनेमा उद्योग पाइरेसी पर सख्ती की मांग करता है, वह जरा आम लोगों की जेब से जुड़े पहलुओं पर भी नजर डाले. अन्यथा हालात यही हो जाएंगे कि फिल्म बनने के बाद या तो डब्बों में पड़ी रहेंगी या फिर उन्हें खरीद कर सिनेमाहौलों में चलवाने वाले वितरक सिर धुनेंगे क्योंकि महंगे टिकट खरीद कर जनता तो उन फिल्मों को देखने के लिए आने से रही.